एक आवारा शायर

मैं रिंद-ए-ज़माना

जो दिल पर गुज़री,
वही ग़ज़ल कह देता हूँ।

रिंद-ए-ज़माना

आज का शेर

दिल का हाल चुनो,
शेर मैं सुनाऊँगा।

पूरी ग़ज़ल

तेरे ही सीने में तूर है

इश्क़ जिस को छू गया उस में ख़ुदा का नूर है
और जो इश्क़ से अलग है, वो अना में चूर है

वो अज़ल की इक सदा थी, क्या मैं तेरा रब नहीं
रूह की वो हाँ अभी तक सीने में भरपूर है

साज़ हूँ मैं, राग उस का, छेड़ने वाला भी वो
मुझ में जो भी बज रहा है, उस का सब दस्तूर है

जो नहीं दिखता है, वो ही सब से बढ़ कर पास है
और जो पास है, वही हर इक नज़र से दूर है

रिंद काबा-ओ-कलीसा में उसे क्यों ढूँढता
तेरे ही सीने में मूसा, तेरे ही सीने में तूर है

रिंद कौन?

न मस्जिद का, न मयख़ाने का।
बस अपने दिल का।

पुराने ज़माने में रिंद उसे कहते थे जो किसी एक दर पर नहीं झुकता — आज़ाद, बेपरवाह, सच्चा। और ज़माना वो है जिसमें हम सब हैं: किराए की छत, नोट पर छपे चेहरे, माँ की अलमारी, और वो ख़ामोशी जो सितार की तरह छेड़े जाने का इंतज़ार करती है।

मैं उन्हीं बातों पर लिखता हूँ जो आप रोज़ जीते हैं। और जो दिल पर गुज़रती है, वो ग़ज़ल बन जाती है।

संग चलो

हर रोज़ एक नया शेर,
एक नई ग़ज़ल।